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कविता पद्य - मुसीबतों के पत्थरों को पिघलाएं



डूबता सूरज कहता, मत कर अहं चाहे हो कितना बल ।

शक्तिशाली होते हुए, मुझे भी जाना होता है ढल ।।

कठोर है पत्थर, पानी तरल निराकार ।

गतिशील है वो, पत्थर का भी बदल देता आकार ।।

राह में आने वाले पत्थरों की, नही करता परवाह ।

बस बहता रहूँ चलता रहू, यही उसकी चाह ।।

पानी से गतिशीलता सीख, कदम हम बढाएं ।

राह में आने वाले मुसीबतों के पत्थरों को पिघलाएं ।।

- संजय वैदमेहता

दोस्तों इस चित्र को देख कर दिमाग में जो विचार आएं उसमें एक चीज हो सकती है - "गतिशीलता "
सूरज भी गतिशील और पानी भी गतिशील. लेकिन एक तपाता है और एक शीतलता देता है ।

लेकिन दुसरी चीज है - सहनशीलता.  समन्दर के बीच खडा पत्थर समभाव से ताप और शीतलता दोनों को ग्रहण करता है । जीवन में सुख दुःख दोनों आते है । चट्टान सा संकल्प बल हो तो जीवन में हर डगर पर पत्थर की तरह अडिग रहा जा सकता है । समभाव से ताप और शीतलता या सुख और दुःख दोनों को ग्रहण करना सीखे।

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